अपनी मस्ती
मंगलवार, २२ दिसम्बर २०२०
सभी तो जीते है अपनी मस्ती में
फिर क्यों बिता दे हम अपनी जिंदगी सस्ती में?
खुद ही तो है हम एक हस्ती!
क्यों हम उसे गम में डुबोएंदिखाए वतन परस्ति।
ये पहाड़ ये नदियाँ
उसपर बसी ये वादियाँ
खल-खल बेहता ये पानी
नहीं सताती हमें ये दुनिया फानी।
पहाड़ ने ये कभीनहीं सोचा
मैं क्यों हु इतना ऊंचा?
में क्यों सर नहीं झुका सकता?
क्यों बहता पानी कभी नहीं रूकता?
सबकी जगा मुकरर है
सबको एहसास है और अपने पे गुरुर है
क्यों हमें यह एहसास नहीं होता?
क्यों मनुष्य हरदम विश्वास खोता।
प्रभु की बनाई ये खूबसूरत दुनिया
हमने उसके अनुरूप नहीं जिया
दूसरों का जीना भी हराम कर दिया!
दूसरों का शुकुन भी हमने छीन लिया?
ये बिलकुल तय है
हमारा लुप्त या विलय हो जाना पक्का का है
ये भी पता है साथ कुछ नहीं ले जाना है!
फिर भी मन क्यों आसक्ति दिखाता है?
चलो हम उठ चले उसके ऊपर
भरोसा और विश्वास करे सब पर
मानवजीवन ही श्रेष्ठ है धरती पर
ज्यादा ना करे किसी प्रकार का शोर।
यदि मन में दुविधाहै तो समाधान खोजे
कभी ना बोये नफ़रत के बीज और सोचे
यदि जीना ही है तो अपने सपने साकार करे
देश, बूढ़े, असहाय, गरीबों की सेवा करे।
तन, मन, धन से रचनात्मक कार्य करे
भावात्मक हो के नहीं पर आक्रमक होकर प्रदान करे
पीछे तो छूट जाएंगे सिर्फ पदनिशान
क्योंना हो जीवन में शांति का निशान?
हम है शांति के समर्थक और दूत
जड़े ओर नीव हो हमारी मजबूत
क्यों मांगते हो हर चीज के सबुत?
जियो शान से बनकर धरती के पूत।
डॉ जाड़िआ हसमुख
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem