अरज सुन ले ... Araj Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

अरज सुन ले ... Araj

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अरज सुन ले
सोमवार, १४ दिसम्बर २०२०

ना बदली कुदरत की माया
ना बदली मैंने मेरी छाया
दोनों समान्तर चलते रहे
एक दूसरे पर छाते रहे।

कुदरत ने कोई कसर नहीं छोड़ी
हमने भी अपनी ओर से लड़ाई छेडी
वो फेंकती गई अपने पासे
मैंने भी जान लिया उसकी चाल दूर से।

उसने कर दिए हमारी जान को खतरा
पर मै भी उसमे खरा उतरा
तरो-ताजा थे तन और मन दोनों
पीछे छोड़ चुके थे और हो गए थे परवानो।

इंसान पर कोई भी हावी नहीं हो सकता
आसानी से दांव नहीं लगा सकता
ठान लिया मन में की ये काम होके रहेगा!
तो फिर वो किसी भी हाल में नहीं रुकेगा।

कुदरत ने नजारा दिखाना ही है
हमने भी अपना कर्तव्य निभाना ही है
जब तक साँसे रुक नहीं जाती
काम से फुर्सत कहाँ है मिल पाती।

हम ठहरे मिटटी के पुतले
कुदरत जब मर्जी आए कुचल ले
पर हम भी ठहरे मतवाले
बस इतनी सी अरज सुन ले उपरवाले।

डॉ जाडीआ हसमुख

अरज सुन ले ... Araj
Monday, December 14, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 14 December 2020

welcome vinod fulee

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Mehta Hasmukh Amathalal 14 December 2020

पर हम भी ठहरे मतवाले बस इतनी सी अरज सुन ले उपरवाले। डॉ जाडीआ हसमुख

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