अरज सुन ले
सोमवार, १४ दिसम्बर २०२०
ना बदली कुदरत की माया
ना बदली मैंने मेरी छाया
दोनों समान्तर चलते रहे
एक दूसरे पर छाते रहे।
कुदरत ने कोई कसर नहीं छोड़ी
हमने भी अपनी ओर से लड़ाई छेडी
वो फेंकती गई अपने पासे
मैंने भी जान लिया उसकी चाल दूर से।
उसने कर दिए हमारी जान को खतरा
पर मै भी उसमे खरा उतरा
तरो-ताजा थे तन और मन दोनों
पीछे छोड़ चुके थे और हो गए थे परवानो।
इंसान पर कोई भी हावी नहीं हो सकता
आसानी से दांव नहीं लगा सकता
ठान लिया मन में की ये काम होके रहेगा!
तो फिर वो किसी भी हाल में नहीं रुकेगा।
कुदरत ने नजारा दिखाना ही है
हमने भी अपना कर्तव्य निभाना ही है
जब तक साँसे रुक नहीं जाती
काम से फुर्सत कहाँ है मिल पाती।
हम ठहरे मिटटी के पुतले
कुदरत जब मर्जी आए कुचल ले
पर हम भी ठहरे मतवाले
बस इतनी सी अरज सुन ले उपरवाले।
डॉ जाडीआ हसमुख
पर हम भी ठहरे मतवाले बस इतनी सी अरज सुन ले उपरवाले। डॉ जाडीआ हसमुख
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