भंवर में फंसा
मंगलवार, ३ अगस्त २०२१
उदासीन हूँ पर तुज से नहीं
नाराज हूँ पर अपनों से नहीं
खुद पर भरोसा नहीं और आस लगाए बैठा हूँ
तारों की टिमटिम देखता हु सूरजपर यकिन नही।
बाहरी चमक से आँखे छकिया जाती है
अंदुरनी कायरता से झेप आ जाती है
मन को मनाने की लाख कोशिश
पर नही मिलती किसीसे आशीष।
खुद के भंवर में फंसा हूँ
अपने आप का फंदा कैसा है
उधेड़बुन है और मन में अराजकता
बना बैठा हूँ लिए आसक्ता।
जवान हु और शूरवीर भी
कर्मठ और धर्मवीर भी
पर ना जाने क्यों मायुसी छा जाती है
अपने आप पर घात लगा जाती है।
दिलवाल हूँ पर दिल दे नही सकता
मतवाला हूँ पर सोच नहीं सकता
चाहता हूँ वैर को समाकर प्रेम करूँ
अपनी आत्मा को सुकून देकर तृप्त करूँ।
जीवन मिला है तो जीना होगा
शहद के साथ जहर भी पीना होगा
अमी बोल से लोगों का दिल जितना होगा
सोइ हुई चेतना को जगाना होगा।
डॉ हसमुख मेहता
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem