भर लो झोली .. Bhar Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

भर लो झोली .. Bhar

Rating: 5.0

भर लो झोली
रविवार, २ अगस्त २०२०

भर लो झोली आज तुम मेरी
सुन लो दिली विनती मेरी
मेरे सपने होंगे कब पुरे?
मेरा दिल कब से पुकारे!

ना चाहे मैंने ऊँचे महल
बस ख्वाब मैं की थी पहल!
अब क्यों होने लगी चहल-पहल?
मन में हो रही बड़ी हलचल।

में एक अदना सा छोटा आदमी
ना जान सका दुनिया मायावी
उसकी हर चाल लगती मुझे फरेबी
हर इंसान लगता मुझे मतलबी।

में रंगना चाहु अपने रंग
ना होने देना उसमे भंग
हर चाल मेरी सब से न्यारी
में घूमता रहा बन अलगारी।

नहीं चाहिए मुझे जन्नत का सुख
बस हंसी बनी रहे चमकते मुख
आप भले ही रखे मुझे वंचित
में कभी भी नहीं रहूंगा चिंतित।

बस थोड़ी सी आस कर लो पूरी
वरना जिंदगी रह जाएगी अधूरी
मेरा भविष्य घुम रहा इस धुरी केआसपास
बस लगा के बैठा हूँ छोटी सी आस।

डॉ। जडिआहसमुख

भर लो झोली .. Bhar
Sunday, August 2, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 02 August 2020

मेरा भविष्य घुम रहा इस धुरी केआसपास बस लगा के बैठा हूँ छोटी सी आस। डॉ। जडिआ हसमुख

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
Close
Error Success