चाहा तो था
रविवार, ६ फरवरी २०२२
चाहा तो मैंने भी था
पर कर नहीं पाया था
हो जाना था कुरबान वतनपर
तिरंगा पहनना था तनपर।
मन पर छायी थी तिरंगे की शान
प्रण लिया था बचाने की आन
दिलोंजान से चाहा देना आहुति
सदा होती रही मन में प्रतीति।
वतन परस्ती की सदा रही खेवना
ऐसा कैसे रहेगा जीना?
जीवन में रखनी थी मशाल की ज्योति को जलना
दिल में नहीं होने देना था कोई छलना।
तन, मन से जुड़ा हुआ है भावात्मक चित्रण
सर उठा हुआ है और मन में है एक मिश्रण
क्योना करे हम जान न्योछावर?
जब भी आती है समय की पुकार!
समय की पुकार सदैव देती ललकार
मन से रहो तत्पर और तैयार
खड्ग तैयार रखो और चमकाओ तलवार
ना देखो कब करना है पलटवार।
देश है हम सबकी धरोहर
स्वतन्त्र सोच और फूलों से भरा गुलमोहर
हम लगाएंगे उसपर भावनाओंकी मोहर
उसका नाम रहेगा पवित्र और मनोहर।
डॉ. हसमुख मेहता
साहित्यिकी
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Author Hasmikh Mehta welcome ..Gulberto Castro Castro
Author Hasmikh Mehta welcome.. Reply5 d Ouley Bah Hi
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