छुपने से... Chhupne Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

छुपने से... Chhupne

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छुपने से
रविवार, २५ अगस्त २०१९

छूपने से छुप नहीं पाया
मुझे मेरा चाँद नजर आया
दूर से ही सही पर दिखा तो जरूर
मुझे देखने के लिए था आतुर।

बड़ी लुपाछिपि की उसने
सताया भी बहुत छुपते छुपते
बादल छटे तो नजर आ गया
उसका सौंदर्य मुझे भा गया।

में ख़ुशी से उछाल पड़ा
मानो भावाओं का उजुम उमड़ पड़ा
मै नेबहुत कौशिक की छिपाने की
पर ना रोक पाया इच्छा देखने की।

"चाँद ही तो हो" मैंने कह ही दिया
संकोच तो बहुत आया
पर दिल हल्का हो गया
मानो प्रेम में उछाल आ गया।

मिलती आगे मुझे शीतल चांदनी
बात पता लगती गई अंदरूनी
उसने भी अपनी रजामंदी जाहिर कर दी
मेरे मन की ख़ुशी को दुगनी कर दी।

मैंने मन ही मन सोचा
अपनी आँखों को बारबार पोछा
बस हर्ष के आंसू छा गए
मेरे मनको हर्षोल्लास कर गए।

हसमुख मेहता
Courtesy: Yuumeiart.com

Sunday, August 25, 2019
Topic(s) of this poem: poem
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Mehta Hasmukh Amathalal 25 August 2019

मैंने मन ही मन सोचा अपनी आँखों को बारबार पोछा बस हर्ष के आंसू छ गए मेरे मनको हर्षोल्लास कर गए। हसमुख मेहता Courtesy: Yuumeiart.com Hasmukh Amathalal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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