दुःख की छाया Dukh Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

दुःख की छाया Dukh

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दुःख की छाया
मंगलवार, ११ अगस्त २०२०

मनपर दुःख की छाया
फिर संकट गहराया
दिल पर बोझ ने कहर कोढाया
मैंने सहनकर उसे अपनाया।

मन ने ढाढस को बंधाया
सुख ओर दुःख संसार के दोहै पहिया
दोनों साथ हो तो आ जाए मजा
एक ही हो ज्यादा तो हो जाए सजा।

मन दुःख का सुमिरन ना करे
सुख आ जाए तो सुख काएतबार करे
हमें तो रहना है दोनों की छाँव में
नहीं समजना इसका क्या दांव है।

मन उसका ध्यान यदिना करे!
दुःख ही उलटे पाँव वापिस फरे
यदिमन में कर जाय अपना बसेरा
तो कैसे होगा उदय का सवेरा?

मानो तोसंसार दुःख का पटारा
दिन में दिखा दे चाँद ओऱ तारा
राह भूलकर ना धरो ध्यान उसी में
डुब जाओगे पुरे बेबसी में।

आ जाए यदि तो स्वीकार करो
सुख होतब भी आदर करो
जीवन की नैया पार करो
अपने मंसूबों को हांसिल करो।

डॉ. जाडिया हसमुख

दुःख की छाया Dukh
Tuesday, August 11, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 11 August 2020

जीवन की नैया पार करो अपने मंसूबों को हांसिल करो। डॉ. जाडिया हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

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