दो गज की दुरी....
शुक्रवार, २४ अप्रैल २०२०
ना थी ये मेरी तमन्ना
ना थी दिली कामना
बस आन पड़ी मुसीबत की बेला
बस बढ़ता गया खुब जमेला।
बात हो गई दुरी की
बस दोगज के फासले की
यदि हमने तोड़ी तो एक गज जमीं के नीचे
जो तूने तोड़ी तोखो जाएगी की समूचे।
तूने बहुत सिखाया
कितनों को रुलाया
किसीने बच्चा खोया तो किसी ने माँ!
बस तमसा गया कारवाँ।
हाथ तो कभी कभी मीला देते थे
अपने मनोरथ दिखा देते थे
आज हम झुककर सलाम करते है
हाथ जोड़कर नमस्ते कहते है।
एक ही ही मर्ज, एक ही दवा
ना रखो किसी ओर की परवा
बस अपमी गृहस्थी को समालो
अपने आप को दरवाजा के पीछे छुपालो।
थोड़े दिन और निकाल दो
कोरोना का निकाला कर दो
रहो स्वस्थ और ना रहो अस्वस्थ
दूसरों का भी ख्याल रखो और बचाओ अपना स्वास्थ्य।
कल का सूरज हमारा होगा
इसका निवारण जरूर होगा
गज की दुरी का यही सन्देश है
कागज की दुनिया है पर हमे अंदेश नहीं है
हसमुख मेहता
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कल का सूरज हमारा होगा इसका निवारण जरूर होगा गज की दुरी का यही सन्देश है कागज की दुनिया है पर हमे अंदेश नहीं है हसमुख मेहता