Mohan Rana

(1964 / Dehli / India)

एक कविता फिर से - Poem by Mohan Rana

नंगे पेड़ों पर
उधड़ी हुई दीवारों पर
बेघर मकानों पर
खोए हुए रास्तों पर
भूखे मैदानों पर
बिसरी हुई स्मृतियों पर
बेचैन खिड़कियों पर
छुपी हुई छायाओं में बीतती दोपहर पर,
हल्का सा स्पर्श
ढांप लेता हूँ उसे हथेलियों से,
उठता है मंद होते संसार का स्वर
आँख खुलते ही

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Poem Submitted: Friday, July 6, 2012

Poem Edited: Friday, July 6, 2012


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