फुले नहीं समाते.. Fule Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

फुले नहीं समाते.. Fule

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फुले नहीं समाते
शुक्रवार, ३० अक्टूबर २०२०

देढ सो रुपिया दो और नाम पाओ
कविता के साथ अपना नाम उजालो
किताब हमारी, नाम आपका
रुपया तुम्हारा, काम हमारा।

मैंने पूछा? येकैसे संभव है?
यहां येरे गेरे नत्थु सब बराबर है।
पैसे देकर ऐसा अन्याय कैसे?
ऐसी कविता से कैसे बचे?

यदि नहीं है इसमें आपकी रूची
और नहीं मिलती है ख़ुशी
तो बेशक आप पैसे मत दीजिए
और नाही लिखिए।

बिलकुल बेशर्मी के साथ एडमिन ने उत्तर दिया
मेरा तो दिल ही बैठ गया
आप कैसे साहित्य की रक्षा करेंगे?
जब ऐसे कवियों से आप पैसे लेते रहेंगे।

हो सकता है आपका उद्देश्य पैसे का ना रहा हो!
फिर भी आप साहित्य की कुसेवा कर रहे हो
इस सेतो दूसरों का मनोबल गिरेगा
वो सच्चे मन से क्या लिखेगा?

पैसे देकर कविता छपवाना
ऐसे लोगों को प्रोत्साहन देना
येतो सरासर बेईमानी का नमूना है
कविओ के लिए नया फार्मूला है।

ना ही उसकी पूरी परख करना
ना उनको सही जगह के लिए परखना
बस यूँही नाम छाप देना
साथ में बड़ा "थैंक यू" कहना।

ये चाहते है हम बस उनको ही पढ़े
तुम्हारा नाम ही आगे नहीं बढे
वो मेढक तरह नहीं फुले समाते
बस शांति से काम और दाम कमाते।

डॉ जाडीआ हसमुख

फुले नहीं समाते.. Fule
Saturday, October 31, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 31 October 2020

फुले नहीं समाते..ये चाहते है हम बस उनको ही पढ़े तुम्हारा नाम ही आगे नहीं बढे वो मेढक तरह नहीं फुले समाते बस शांति से काम और दाम कमाते। डॉ जाडीआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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