गोरा हो या काला... Gora Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

गोरा हो या काला... Gora

Rating: 5.0

गोरा हो या काला
रविवार, १ मार्च २०२०

गोरा हो या काला हो
पर दिल से मतवाला हो
सभी का रखवाला हो
दिल को जितनेवाला हो।

ना चमड़ी से हो पहचान
ना चेहरे से उसकी शान
बस चलन उसका अच्छा हो
मेरे दिलको बहुत भाता हो।

ना मैंने कभी गौर किया
ना कभी कोई शोर मचाया
बस दिल को खूब मनाया
उसको अपने में समाया।

वो रहां इंसानियत की मिसाल
उसकी हरकत भी रही बेमिसाल
में फ़िदा होती गयी
मन ही मन मुस्कुराती गई।

मेरे दिल का ना पूछो हाल!
उसने कर दिया है बेहाल
अब तो दुरी सहन नहीं होती
दिल मेंछुपी आशा को बता नही सकती।

रहे सदावो मेरे मन में
अटखेली करता रहे तन में
मन ही मन में सपने में राचु
खुले आकाश के तले मन से नाचु।

रहे ना कोई प्यार से वंचित
ये ना रहेगा कभी उचित
में रहूं सदा दिल से चिंतित
मेरा कलंकित हो ना अतीत।

हसमुख मेहता

गोरा हो या काला... Gora
Saturday, February 29, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 29 February 2020

रहे ना कोई प्यार से वंचित ये ना रहेगा कभी उचित में रहूं सदा दिल से चिंतित मेरा कलंकित हो ना अतीत। हसमुख मेहता

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
Close
Error Success