हम नहीं हो सकते.. Ham Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

हम नहीं हो सकते.. Ham

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हम नहीं हो सकते
सोमवार, १४ दिसंबर २०२०

सब नहीं होते,
पर जो भी होते
वो हमेशा रेहते बेशरम
नहीं होता उनके पास कोई मरहम।

दुनिया भी है पैसो की दीवानी
मुझे हमेशा होती है हैरानी
पैसे के अलावा उनका कोई भगवान् नही
बस तलबे चाटते सब उनके यही।

उनके हर बोलपर होती वाहवाही
बाकी की भले ही हो तबाही
हरदम उनके पहरेदार रक्षा करते
अंदर मिलने की इजाजत नहीं देते

गरीब को पाँव की जुती समझते
हरबार बात-बात पर उसका अपमान करते
अपने अंदाज़ से वाणी-विलास भी करते
आम आदमी कड़वा घुट समझकर पी लेते।

ना वो किसी से मेलजोल रखते
नाही किसीको नजदीक आने देते
धंधे का राज आसानी से अपने अंदर दफ़न कर देते
किसीको भी उसकी भनक नहीं आने देते।

ऐसा मानवजीवन उनको ही मुबारक हो
जिसमे अपना जीवन नरक बन जाता हो
मानव में मन जिवंत होके धड़कता हो
एक दूसरे के प्रति सहानुभूति रखता हो।

पैसा आज जरुरत बन गया है
इसके बिना जीवन अर्थहीन हो गया है
पैसे के बिना आज हॉस्पिटल भी मुर्दे को देने से मना कर देते है
हर चीज में आज लोग व्यापारीकरण कर देते है।

हमें तो जीना है
सब को साथ रखना है
एक ही तो कड़ी है हमारे बीच
हम कैसे निर्लज्जता से बन सकते है नीच।

डॉ जाड़ीआ हसमुख

हम नहीं हो सकते.. Ham
Sunday, December 13, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 14 December 2020

हमें तो जीना है सब को साथ रखना है एक ही तो कड़ी है हमारे बीच हम कैसे निर्लज्जता से बन सकते है नीच। डॉ जाड़ीआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathalal 14 December 2020

Hasmukh Mehta Vinod Fullee · Reply · 1m · Edited

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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