जाग मुसाफिर... Jaag Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

जाग मुसाफिर... Jaag

Rating: 5.0

जाग मुसाफिर
Monday, December 23,2019
9: 26 PM

उठ जाग मुसाफिर दिन आ गया
तेरे जाने का मुहूर्तनिकल गया
बसा बसाया सब, छोड़ के जाना है
यही दुनिया की परम्परा है।

माँ-बाप है तेरे कुटुंब कबीला
चलती रही है ये राम की लीला
अब तक तो तेरे साथ रहे है
अब छुट्नेकी बारी तेरी है।

ये मंझिले ये धनदौलत
अब तुझे क्या है मतलब!
ना साथ आना, सब छूट जाना
फिर काहे का बनाना बहाना।

तन छोड़ेगा, साथ तुम्हारा
तू रह जाएगा बन के बेचारा
ना कोई साथ तेरे आएगा
पीछे रहकर आंसू बहाएगा।

नाम तेरा यदी लिया जाएगा
सही कामों को याद करेगा
"मर गया धरती से बोझ हट गया"
अच्छा हुआ वो जल्दी मर गया।

किया होगा भला, सही अंत भी होगा
जमाने में तेरा, नाम अमर होगा
तेरा कद परछाई से बड़ा होगा
सब की जुबान से एक नाम होगा

हसमुख मेहता

जाग मुसाफिर... Jaag
Monday, December 23, 2019
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 23 December 2019

किया होगा भला, सही अंत भी होगा जमाने में तेरा, नाम अमर होगा तेरा कद परछाई से बड़ा होगा सब की जुबान से एक नाम होगा हसमुख मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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