कदम... Kadam Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

कदम... Kadam

कदम
सोमवार, २६ अगस्त २०१९

बढ़ते गए मेरे कदम उस ओर
जहाँ से आ रहा था मन का शोर
बस यूँही में चलता गया
मन में उसकी याद ही भरता गया।

कदमो की आहट तो सुनाई दी
खुबसुरती भी मन में दिखाई दी
मन फिर भी बहावरा-सा हो रहा
सारा जग सोता रहा, बस में ही चलता रहा।

क्यों मुझे चेन नहीं आ रहा?
क्यों दिल बारबार तड़पता रहा?
उसने क्यों कुछ नहीं कहा?
बस दिल यूँही पूछता रहा।

क्या ये मन का वहम है?
क्यों बेचेन कदम है?
बस एक बार तो कह दो!
जाओ दूर मुझसे, अकेला छोड़ दो।

नहीं मानता ये बुझदिल दिल
हरदम कहता रहता "मिल"
मिलने से फासले कम हो जाते है
रिश्ते वैसे ही तो बनते है!

सोचा है ये बात हम कभी नहीं करेंगे
अपने आप घुटन महसूस करते रहेंगे
दबी आवाज में भी एहसास नहीं होने देंगे
पर प्यार का आगाह तो करते ही रहेंगे।

हसमुख मेहता
Courtesy: Northern Echo

Sunday, August 25, 2019
Topic(s) of this poem: poem
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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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