कुदरत की मार... Kudrati Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

कुदरत की मार... Kudrati

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कुदरत की मार
गुरूवार, १ अगस्त २०१९

कुदरत की दोहरी मार
एक और धुआंधार बारिश कीधार
दूसरी और सूखे की चपत
कैसे रखे हम धरपत?

पूरा देश जलप्रलय से प्रभावित
किसकी सुने आपवीत?
यह सब हमारी है करतूत
पुरे जंगल हो गये भस्मीभूत।

हमने पुरे वातावरण को दूषित किया
हवा को पूरी तरह कलुषित किया
पानी में भी रासायनिक प्रवाही को मिलाया
एक थोड़े से लाभ के लिए सब का जीवन दुर्भर किया।

पूरा जीवन पैसे को पीछे लगाया
अपने खुद के लोगों का रक्त बहाया
प्रकृति के प्रवाह को अवरोधा
अपने लाभ को हर चीज़ में खोजा।

नदी नाले सब पर अपना जमावड़ा
प्रकृति के हर मोड़ पर आदमी अडा
पाने को बहने की जगह नहीं
सब को साफ़ हवा लेने का अवसर भी नहीं।

सब दिशाओं में आदमी का अतिक्रमण
सभी चीजों में बनावटी चीजों का मिश्रण
सेहत के साथ खिलवाड़
मोत के साथ भी जुगाड़।

अगले कुछ सालें में इसका दिखेगा असर
कोई भी उपाय होगा बेअसर
आदमी, आदमी का हो जाएगा दुश्मन
कैसे रहे शांति हमरे मन?

हसमुख मेहता

कुदरत की मार... Kudrati
Thursday, August 1, 2019
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 01 August 2019

अगले कुछ सालें में इसका दिखेगा असर कोई भी उपाय होगा बेअसर आदमी, आदमी का हो जाएगा दुश्मन कैसे रहे शांति हमरे मन? हसमुख मेहता Hasmukh Amathalal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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