क्या काम का? Kyaa Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

क्या काम का? Kyaa

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क्या काम का?
बुधवार, १५ अप्रैल २०२०

वरना ये दिल क्या काम का?
जो सताये रहे खामखा
जलाने पर तुला है आखिर क्यों?
हम ने क्या क्या नहीं किया उसके खातिर!

वो कहता गया में सुनता गया
सुनके बातोंको गुनगुनाता रहा
सबकुछ मेरा था, पर वो बताता रहा।
अपने कारनामों को बारीबारी कहता रहा।

मेरे को था भरोसा उसपर जान से ज्यादा
पर वो रहा अकड़ू और फिर आमादा
लानेपर तुला था एक और विपदा
क्यों वो करता रहा ऐसा सदा?

मेरे दिल में उठ रहा एक संशय
क्या होगाउसका तर्क और आशय
वो महाशय तो मुझे दे देते है कल्पना
और में करता रहता हु उसकी आराधना।

करने दो उसे अपनी मनमानी
में भी तो हु सदा स्वमानी
नहीं सुनूंगा उसकी एक बात भी
करता रहूंगा कदर अपने आप की।

हसमुख मेहता

क्या काम का? Kyaa
Tuesday, April 14, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 14 April 2020

करने दो उसे अपनी मनमानी में भी तो हु सदा स्वमानी नहीं सुनूंगा उसकी एक बात भी करता रहूंगा कदर अपने आप की। हसमुख मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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