ललकार... Lalkaar Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

ललकार... Lalkaar

Rating: 5.0

ललकार
शुक्रवार, १५ फरवरी २०१९

याद करो वो कुर्बानी
जब गई थी जान जवानो की
हँसते हुए दे दी जान
पर नहीं जाने दी वतन की शान।

आज फिर दोहराई
वीरता की कहानी
जब दुश्मन भागता नजर आया
और कभी इस तरफ देख ना पाएगा।

कायरता की हद हो गई
जब आतंकियों ने घात लगाई
कई जवान हताहत हुए
और कई मौत को प्यारे हो गए।

आज हमें दोहराना है
यशगाथा को साबित करके दिखाना है
जो हुआ उसका खामिआजा उसे भुगतना पडेगा
बड़ी से बड़ी किम्मत में चुकाना पडेगा।

हमारे देश रहते है बहुत गद्दार
उनको करना है तड़ीपार
और दुश्मन को देना है ललकार
मचा देंगे खूब हाहाकार।

हसमुख मेहता

ललकार... Lalkaar
Friday, February 15, 2019
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 15 February 2019

S.r. Chandrslekha 82 mutual friends

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Mehta Hasmukh Amathalal 15 February 2019

Tum Yang Hang Limbu 12 mutual friends

0 0 Reply
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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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