भाषा Poem by lucy Bisht

भाषा

अपनी भाषा का दर्जा ऊँचा चाहते हैं
लालसा में अपनी, मारते मरते हैं
विविधत लोगों का मन विभाजित करते हैं
अपनी संतुष्टि हेतु क्या-क्या नहीं कर देते हैं।
मातृभाषा का औदा तोलते फिरते हैं
अर्थ मातृ का जान नहीं पाते हैं ।
उठा लेते हैं खड्ग, वीर दिखने को
सम्मान समझते हैं, दूसरे को औछा बताने को।

टाइगर की बंगला का मान हमे
ब्रिज की मिरा का सम्मान हमें
एक्कबाल के 'सारे जहाँ' से प्रेम है हमें
संगम और संस्कृत को पूजते हैं हम।
क्या फिर
भाषा विवाद करना मुनासिब यहाँ
यूँ भेद भाव करना उचित हैं क्या?

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