लेख Poem by lucy Bisht

लेख

वस्त्रधारी को वस्त्रहीन करता
बेहया भाव, वो,
नग्न होने तक लिखता है

ख्याल इज्ज़त का ना उसे,
तुम मदहोश कहो उसे
बयान करने से न वो चुकता है।

अपने को छलनी करना
कहाँ सज़ा है!
पेशा मनोवांचित उसका यह है।

तहज़ीब अपने में न जताई गई
मिथ्या की परत खुलाई गई
निष्कपटता उसने लिखाई कि।

अफ़वाहहे उसकी भी खूब हुई
जमकर बेशर्म विरोध हुआ,
एक दफ़ा फिर
करी है चेष्टा कर-कमलो ने
सहा हैं कष्ट कमल-देह ने!
लिखना सही एक बार, फिर
गलत सिद्ध हुआ ।

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