बिखरती हुं मैं
अपने रंगों की धारा में
धारा मेरे अश्रुओं की होती
और रंगों में मेरे भाव बेहते
नयन से हाथों तक और
कभी कभी होठ छू जाती
धारा के साथ मैं बिखरती जाती।
बिखरती हुं मैं
उस छत में जो मेरी सहेली है
उस आसमां में जो मेरी छत है
उस अंधेरे के साथ जिसका साथ मैं नहीं देख पाती
उस चांदनी के लिए जो शायद मेरे लिए ही आती
पर मैं उसका इकरार ना कर पाती
चांदनी के साथ मैं बिखरती जाती।
बिखरती हुं मैं
आज़ादी के लिए, जो लोग नहीं,
मैं खुद जो स्वयं को नहीं दे पाती
अपेक्षाऐं के लिए, जो अपूर्ण रहती
सुख जो मैं स्वयं के साथ साझा नहीं कर पाती
दुःख जो मेरा नहीं है पर मैं अपना मानती
दुःख के साथ मैं बिखरती जाती।
बिखरती हुं मैं
कुछ सवालों का जवाब जानने को
अपनी गलतियां समझने को
सब्र का बांध तोड़ने को
अपने साथ में बैठने को
नग्नता अपनी देखने को
नग्नता के साथ मैं बिखरती जाती।
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