सुबह का दृश्य Poem by M. Asim Nehal

सुबह का दृश्य

Rating: 5.0

जब सरसराहट करती पत्तियों नाचती और झूमती हैं,
कहीं एक मौन सत्य अपना रास्ता खोजने में लगा रहता है,
कसकर बुनी पड़ी एक पीड़ा कि सिम्फनी
फिर अंधेरे से लड़कर एक नयी रोशनी लाती है।

उदास आसमान के बोझ तले,
उलझे हुए बेलों में जहाँ सन्नाटा है,
एक ओस कि तरह कोमल
आशा फिर टिमटिमाती है।

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M. Asim Nehal

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Nagpur
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