तुम सब वापस आओगे Poem by M. Asim Nehal

तुम सब वापस आओगे

बाज़ार की हलचल और सौदेबाज़ी के शोर के बीच,
एक शांत कब्रिस्तान एक अलग ही कहानी कहता है।
वहाँ आमने-सामने, शांति से खड़े लोग,
एक सच के सामने जहाँ सारी इच्छाएँ खत्म हो जाती हैं।

आसमान छूती ऊँची इमारतों से घिरे हुए,
वे ज़िंदा लोगों को भागते और मोल-भाव करते देखते हैं।
जहाँ मौत का समय बुलावे और सौदे से परे तय होता है,
न कोई कागज़ पर दस्तख़त, न कोई कानून का दायरा ।

एक आँसू चालक आता है जिसे झट से पोंछ दिया जाता है,
क्योंकि बाज़ार इंतज़ार कर रहा है बड़ी बेसब्री से आपका ।
ज़मीन उन्हें अपनाती है, प्रार्थना पढ़ी जाती है,
क्रिया कर्म की रस्मों से मृतक के प्रति फ़र्ज़ पूरा हो जाता है।

और जैसे ही आप मुड़ते हैं, आपके कदमों का बोझ हल्का हो जाता है,
ज़िंदगी आपको वापस खींचती है बड़ी तेज़ी से शोर के साथ,
और फिर शायद कब्रिस्तान शांत और समझदारी भरी मुस्कान के साथ कहता है:
'तुम सब वापस आओगे, चाहे तुम्हें कुछ भी कितना ही प्यारा क्यों न हो दुनिया से '

This is a translation of the poem Graveyard Tells A Softer Tale. by M. Asim Nehal
Sunday, October 4, 2026
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