मैंने काटा... Maine Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मैंने काटा... Maine

मैंने काटा
सोमवार, १४ जनवरी २०१९

काटा, काटा मैंने काटा
मेरा पतंग उसने काटा
अब बताओ किसका हुआ घाटा
जब हवा ने ला सपाटा।

सारा दिन चिल्लाते रहे
बोलते रहे, काटते रहे
आनंद उसका लेते रहे
पर दूसरे का दुःख किसको कहे।

पंखी बेचारे डर के मारे
इधर से उधर उड़ते रहे
किसीका पँख कटा तो किसी की टांग टूटी
कइयों की तो जान ही चली गई।

ये कैसा पागलपन है?
हंसी मजाक हमें मिले, और दुःख दूसरों को मिले
मानवजात को ये अच्छी तरह समझना होगा
दूसरों का दुःख अपनाना होगा।

यदि दे ना सको किसी को जान
क्यों हर लेते हो उसके प्राण
यदि जीना आपका हक़ है अनमोल
क्यों करते है लोग फिर हल्लाबोल?

हसमुख मेहता

मैंने काटा... Maine
Monday, January 14, 2019
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 14 January 2019

Tum Yang Hang Limbu 11 mutual friends

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The Crow 14 January 2019

Wonderful poem! Well penned

0 0 Reply
Mehta Hasmukh Amathalal 14 January 2019

यदि दे ना सको किसी को जान क्यों हर लेते हो उसके प्राण यदि जीना आपका हक़ है अनमोल क्यों करते है लोग फिर हल्लाबोल? हसमुख मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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