मन ही है .. Manhi Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मन ही है .. Manhi

Rating: 5.0

मन ही है
Monday, September 21,2020
8: 25 AM

मन ही है मुख्य
बातें तो होती है असंख्य
लगता है कभी कभी डंख
पर नहीं होता असर जब बजता है शंख।

मन की बात मन ही जाने
हम तो रहेंगे मन के मतवाले
बन भी सकते है परवाने
यदि लगेंगे दूसरे मनवाने।

हम क्यों कहे मन को?
क्या अधिकार है तन को?
तन अपनी चेष्टा करे!
मन अपनी पराकाष्टा करे।

हम ने एक चीज़ को माना
बाकी तो सब है बहाना
यदि मन है मक्कम
टीचलेगी किसीकी भी तिकड़म।

मन से करो मुकाबला
तन से करा सामना
दोनों का है ये संघर्ष
जरूर होगा आपका उत्कर्ष।

जज्बात को को छूना जोई गुनाह नहीं
किसीकी गुजारिश पर पनाह देनाअमानवीय नहीं
हम तो है मन के अमीर
दिखा देंगे अपना खमीर।

तन से जुड़ा मन
मन से जुड़ा अभिमान
गुरु जरूर हो ना की गुमान
वो जरूर से करा देगा अपमान।

तन से जोड़ो नाता यदि मन को है भाता
ये तो बनता है सोने पे सुहागा
जो नहो जोड़ता वो है अभागा
किस्मत का मारा दुनिया से भागा।

डॉ जाडीआ हसमुख

मन ही है .. Manhi
Sunday, September 20, 2020
Topic(s) of this poem: poem,september
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 21 September 2020

S. R Chandralekha 👏💕Super 🙏🌿🌹🙏🙏 1 Hide or report this Like · Reply · 8h

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Mehta Hasmukh Amathalal 20 September 2020

जो नहो जोड़ता वो है अभागा किस्मत का मारा दुनिया से भागा। डॉ जाडीआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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