Mansuar Hasan (25/01/17) Poem by Anjum Alinagari

Mansuar Hasan (25/01/17)

मौत तो एक बहाना फक़त है,
मौत का कुछ ठिकाना नहीं है।

कौन कहता है पुछो ज़रा सा,
मुझ को दुनिया से जाना नहीं है।

रूहे मंसुर कहती है सब से।
मेरा मिलना हुआ मेरे रब से।

दीनों दुनिया की दौलत मिली है।
बाग़े जन्नत में कलियाॅ खीली है।

मुशको अम्बर से दिल शादमाॅ है।
दुनिया वालों से बेहतर मकाॅ है।

साथ मेरे नबी की है सुन्नत।
साथ मेरे क़ुरऑ की तिलावत।।।

मेरा ईमान है मेरी ताक़त।।
काम आती है हर एक एबादत।

राहे हक़ चला हूॅ हमेशा ।
दीने इस्लाम था दिल का पेशा।।।।

ख़ाब ख़ूबी बयाॅ कर रही थी।
मुहॅ में छीप के ज़बाॅ डर रही थी।

अश्क आॅखों से यूॅ बह रहा था।
ग़म अकेला ये दिल सह रहा था।

हक़ के दाई बने और रहबर ।
ईल्म के थे यक़िन्न समंदर ।

प्यारो ऊल्फत के वो पासबाॅ थे ।।।
इस जहाॅ में वो एक गुलसीताॅ थे।

थे मोहब्बत के बानि , वो नाना ।
जिनकी ख़ुबी है मुशकिल बताना ।

मौत तो एक बहाना फक़त है।
मौत का कुछ ठिकाना नहीं है।

रचना&लेख: - अंजुम फिरदौसी

(Block: -Alinagar, Darbhanga, Bihar)

Mansuar Hasan (25/01/17)
Thursday, January 26, 2017
Topic(s) of this poem: sadness
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