Mashaal Poem by Anjum Alinagari

Mashaal

( चल ऊठा ले अपने हाथों में मशाल)

चल ऊठा ले अपने हाथों में मशाल।
ईसलिए के देश का बिगड़े न हाल।

धर्म का कोई न पाखण्डी बने।
देश का कोई न आतंकी बने।

कोई भी मासूम को तड़पाये न।
हक़ को कोई झूठ से झूठलाये न।

चल ऊठा ले अपने हाथों में मशाल।
ईसलिए के देश का बिगड़े न हाल।

सबसे पहले धर्म है इंसानियम।
अये सयासत बंद कर तू शै तनत।।

जुल्म को ज़ालिम को देना मात है।
है वतन मेरा यही ज़ज़्बात है।

चल ऊठा ले अपने हाथों में मशाल।
ईसलिए के देश का बिगड़े न हाल।

रचना एंव लेखः- -अंजुम फिरदौसी
Anjum Firdausi
(ग्रा+पो-: अलीनगर, दरभंगा, बिहार)

Tuesday, January 10, 2017
Topic(s) of this poem: nazm
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Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
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