मायूस बनाकर... Mayus Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मायूस बनाकर... Mayus

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मायूस बनाकर
शुक्रवार, ३० अगस्त २०१९

नहीं मिलती सबको अपनी जगह
कुछ तो रहती होगी उसकी वजह
अपना वजूद सब ढूंढते है
जिसे मिल जाए वो खुशनसीब मानते है।

सुबह होती है और शाम भी
पर नहीं हॉट काम हम भी
आँखे ढूंढती रहती है
किसीको अपना बनाना चाहती है।

मिल जाए तो किस्मत के सिकंदर
हो जाती जगह जगह कदर
ना मिले तो बदनामी का भंवर
रहना पड़ता है सम्हलकर।

कल का नहीं मुझे मालुम
पर चिंता सताती हरदम
ये दिन तो यूँही कट जाएगे
हमें बस मायूस बनाकर छोड़ जाएंगे।

हसमुख मेहता

Saturday, August 31, 2019
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 31 August 2019

कल का नहीं मुझे मालुम पर चिंता सताती हरदम ये दिन तो यूँही कट जाएगे हमें बस मायूस बनाकर छोड़ जाएंगे। हसमुख मेहता Hasmukh Amathalal

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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