मेरा घर... Mera Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मेरा घर... Mera

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मेरा घर
मंगलवार, २० नवम्बर २०१८

ये मेरा घर
बनाया धरतीपर
तुम्हे छत देने के लिए
अपनी छाती से लगाने के लिए। क्या

मेरे जज्बात
में क्या करूँ बात?
बहुत आए झंझाबात
पर नहीं हिली और रही साथ।

इस में ही है मेरा अस्तित्व
अपना सार और सत्व
देना बहुत सारा महत्त्व
पाओगे अपना जीवन का तत्व।

ये ईंट और चुना नहीं है
मेरा पसीना और जिंदगीभर की कमाई है
मेरा सारा ईमान इसमें लगा हुआ है
मैंने बहुत सारे दुःख झेले है।

सम्हालना बच्चे मेरे
जब तक ना देखो उझाला सवेरे
जिंदगी हर मोड़ पर इम्तेहान लेगी
आपको परेशान करती रहेगी।

में नहीं, मेरी यादें रहेगी
आपको बारबार सताएगी
पर एक बात याद रखना
किसी बेगुनाह को नहीं सताना।

मेरी दुआएं आपके साथ है
मेरी आँखे हरदम आपको देखती है
आशीर्वाद सदा तुम्हारे सरपर है
बस आपने करना थोडासा इंतजार है।

हसमुख मेहता

मेरा घर... Mera
Monday, November 19, 2018
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 20 November 2018

Waaah 🙂 Bahut khoob 🙂.. tribhvan kaul

0 0 Reply
Mehta Hasmukh Amathalal 19 November 2018

मेरी दुआएं आपके साथ है मेरी आँखे हरदम आपको देखती है आशीर्वाद सदा तुम्हारे सरपर है बस आपने करना थोडासा इंतजार है। हसमुख मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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