मिले कोई आशियाना ... Mile Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मिले कोई आशियाना ... Mile

Rating: 5.0

मिले कोई आशियाना

सोमवार, ३० जुलाई २०१८

चाहा हमनेमिले कोई आशियाना
यही तो थी हमारी दिली तमन्ना
हमने कभीनहीं किया मना
बस कभी हाँ में उत्तर नहीं सूना।

जमीं तो थी ही उपजाऊ
पर उसमे कैसे उगाऊ?
कैसे दिली तमन्ना को बताऊँ?
पर सोच लिया जी अबकी बार उसे जताऊ।

हिम्मत कर के दिली दानों को मुठी में बंध कर लिया
जमीं ताज़ी ही हुई थी गीली सो बो दिया
पर मन में एक लकीर सी खिंच ली
जमीं को मन ही मनसींच ली।

सोचा प्यार जरूर पनपेगा
मन में उमंग जरूर जगाएगा
छोटा पौधा जोर उभर आएगा
हमारे प्यार की कहानी दोहराएगा।

लग तो रहा है
सपना पूरा हो रहा है
वो भो धीरे से कान में फुसला रही है
लगता है मेरी मन्नत भी पूरी हो रही है।

कई दिनों से चाह बढ़ रही थी
वो भी हमें बहका रही थी
अपने मन का भेद नहीं बता रही थी
पर होले होले से मनका भाव जता रही थी।

हसमुख अमथालाल मेहता

मिले कोई आशियाना ... Mile
Sunday, July 29, 2018
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM

welcome Warrence Oghenevwegba 24 mutual friends

0 0 Reply

कई दिनों से चाह बढ़ रही थी वो भी हमें बहका रही थी अपने मन का भेद नहीं बता रही थी पर होले होले से मनका भाव जता रही थी। हसमुख अमथालाल मेहता

0 0 Reply

welcome manisha mehta 1 Manage Like · Reply · 1m

0 0 Reply

welcome pedro alberto canda 1 Manage Like · Reply · 1m

0 0 Reply

welcome Meralyn Sumayo Ofqueria 1 mutual friend Friend Request Sent

0 0 Reply

welcome Alexis Ogunmokun 143 mutual friends 1 Manage Like · Reply · 1m

0 0 Reply

welcome Sabrina Young 107 mutual friends Message

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
Close
Error Success