मोरे अवगुण ...More Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

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मोरे अवगुण
रविवार, २० दिसंबर २०२०

वोही कहलाता है भक्त
जो याद प्रभु को करता है हर वक्त
कहता है "प्रभु मोरे अवगुण चित ना धरो"
पाड़ करे दूजेपर पर अपनेविचारो।

हर चीज़ में दिखता उसे प्रभुदर्शन
देदीप्यमान और साक्षात धरी सुदर्शन
पावन हो जाता उसका मन
ना होता तो व्याकुल हो जाता अधिरमन।

ना देह की चिंता, ना मन में दुविधा
ना मांगे कोई अपने लिए सुविधा
रटण करे हरदम भूल जाए अपनी हस्ती
प्रभु दर्शन की लालसा है उसकी मस्ती।

नहीं कोई आसक्ति
प्रभु देते रहते है उसे शक्ति
ना रहता वो कभी भी आशंकित
मन रहता सदासुखी और पुलकित।

मन रहता सदा उड़ने को आतुर
प्रभु को मिलने को सदा चिंतातुर
वो घडी भी आ जाएगी
मिलन की आस सदैव छिपाएगी।

भक्त की भक्ति में है दीवानगी
उसे मिली हुई है सदा परवानगी
उसके शिरमौर है कलगी
कभी नहीं होती प्रभु से मिलने की दिल्लगी।

डॉ जाड़ीआ हसमुख

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Sunday, December 20, 2020
Topic(s) of this poem: poem
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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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