ना कभी... Naa Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

ना कभी... Naa

ना कभी
गुरूवार, २ जनवरी २०१९

ना कभी में जान पाया
मन में ही ख्याल नहीं आया
में रहा किस्मत का सताया
जो भी जीवन में आया, मुझे खूब रुलाया।

ना मुझे कोई चाह रही
ना ही जीवन में रूचि रही
बस में यूँही गरता में चला गया
दिन, रात बस सोचता ही रहता गया।

मत देना ये झख्म
बस बता देना कोई इल्म
भले ही करते रहो जुल्म
पर साथ देते रहना मरहम।

मुझे कुछ भी तो नही मिला
सोना, जागना बह नहीं बना
रातो में नींद हराम हो गई
जिंदगी मानो बेकार सी हो गई।

प्यार मेरी रही संपदा
भले ही ले आई विपदा
मे विचलित फिर भी नहीं हुआ
प्रभु पाड मानकर आगे बढ़ता ही गया।

प्रेम ईश्वरीय देन है
विचलित करनेवाले नैन है
सही मायनो में मिल जाए तो बेड़ा पार है
उसकी किरपा अपरम्पार है।

हसमुख मेहता

ना कभी... Naa
Wednesday, January 1, 2020
Topic(s) of this poem: poem
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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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