ना छोड़ा.. Naa Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

ना छोड़ा.. Naa

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ना छोड़ा
रविवार, १४ जून २०२०

सिख लिया, माहिर भी हो गए
लेकिन वहीँ के वही ही रह गए
पानी को पत्थर पर बहा दिया
पर वो तो कोरा का कोरा ही रेह गया।

ऐसी क्या बात है की हम नहीं सुधरेंगे?
कुछ चीजों को अपनाने ही नहीं देंगे
कोई जा रहा सही पर उसे अपना जैसा बना देंगे
अपने ही रंग में रंगकर वैसा ही बना देंगे।

ना छोड़ा हमने जिद्दीपना
ना अपनाया किसीको अपना
बस जहाँ मिला माल, कर दिया हाथ साफ़
पकडे गए तो बोल किया कर दो हमें "माफ़".

कहने को तो कितना भी अच्छा बोल देते है
अपने आपकी पाक-दामनसंज्ञा दे देते है
जैसे जीवन में कुछ भी बुरा नहीं किया
पर समय आनेपर पीछे वार कर दिया।

दुसरों को तो सिख देता रहा
पर अपना मन मलिन रखा
बस चुराए हुए फलों लो चखता रहा
दूसरों की तकलीफ देखकर हँसता रहा।

मुझे नहीं मालुम " अच्छाई" क्या होती है?
यदि ऐसा है तो बुराई की वाहवाह क्यों होती है?
सच्चे इंसान का कोई साथी नहीं या संगाती!
कुदरत भी क्या क्या रंग दिखलाती!

हसमुख मेहता

ना छोड़ा.. Naa
Sunday, June 14, 2020
Topic(s) of this poem: poem
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मुझे नहीं मालुम " अच्छाई" क्या होती है? यदि ऐसा है तो बुराई की वाहवाह क्यों होती है? सच्चे इंसान का कोई साथी नहीं या संगाती! कुदरत भी क्या क्या रंग दिखलाती! हसमुख मेहता Hasmukh Amathalal

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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