ना समजो तो... Naa Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

ना समजो तो... Naa

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ना समजो तो
बुधववार, १४ नवंबर २०१८

हम तो बुरे ही सही
यदि आपने मानना है यही
कहाँ की रीत है ऐसी?
जो नहीं समज ती हमारी बेबसी।

अपने को ही समजो बेहतर
इसी में ही भलाई है ज्यादातर
हम बाते करते है इतर
पर नहीं बनाते अंतर।

भल बुरा कोई नहीं होता
सब को समय का शिकार होना पड़ता
कोई मज़बूरी में बुरा हो जाता
तो कोई अपनी आदत से लाचार होता।

पर अच्छे लोग अपनी भली नहीं छोड़ते
नाही वो किसी को भला बुरा कहते
वो अपने पर ही इसका प्रयोग करते
और सबके बीच बात को नहीं दोहराते।

आप भला तो जग भला
साधु तो चलता भला
हम भले ही साधु ना बन सके
पर दूसरों को तो अपनी खूबी तोबता सकते।

यही मानव जीवन है
अतिउत्तम और पावनकारी है
समजो तो यही स्वर्ग है
ना संजो तो नर्क ही है।

हसमुख मेहता

ना समजो तो... Naa
Tuesday, November 13, 2018
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 13 November 2018

यही मानव जीवन है अतिउत्तम और पावनकारी है समजो तो यही स्वर्ग है ना संजो तो नर्क ही है। हसमुख मेहता

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Mehta Hasmukh Amathalal 13 November 2018

यही मानव जीवन है अतिउत्तम और पावनकारी है समजो तो यही स्वर्ग है ना संजो तो नर्क ही है। हसमुख मेहता

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