नाम प्रणामी..Naam Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

नाम प्रणामी..Naam

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नाम प्रणामी
गुरूवार, ३ सितम्बर २०२०

में खोता चला गया ज़मी
जब तूने ना भरी हामी
मेरा नाम था प्रणामी
पर मिल गयी मुझे बदनामी।

प्यार का जिक्र क्यों करे कोई?
प्यार करे सो बदनाम होइ
बन पड़े तो अच्छेबीज बोई
पर ना करना उसे पराई।

ये तो परभव की है एक परछाई
जो मेरे मनपर है खुब छाई
शांति फिर भी ना मिली
जब की ओढ़ली थी रजाई।

ना की देह की परवा
पर अब रुक गया है कारवाँ
में तो बन गया एक मुसाफिर
जिस की रुक जानी है सफर।

में नहीं रुकुंगा अब
भले ही हो जाए मेरे दुश्मन सब
मैंने तो मेरा दिल ही दिया था
उन्होंने तो मेरा पूरा बदन ही जला दिया था।

डॉ जाड़िआ हसमुख

नाम प्रणामी..Naam
Thursday, September 3, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 03 September 2020

मैंने तो मेरा दिल ही दिया था उन्होंने तो मेरा पूरा बदन ही जला दिया था। डॉ जाड़िआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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