वैकुण्ठ में मुझे नहीं जाना
मंगलवार, २२ जनवरी २०२०
वैकुण्ठ में मुझे नहीं जाना
सामळिया मुझे वैकुण्ठ को नहीं जाना
मेरे मन की व्यथा को किसे सुनाऊँ?
मन ही मन धीरे से समजाऊँ। वैकुण्ठ में मुझे नहीं जाना, सामळिया मुझे वैकुण्ठ को नहीं जाना
मेरी धरती के गुण को गाना
यशोगान और कीर्ति को सुनाना
इस धरती की महक को, कैसे भुलाउं
स्वर्ग की धरा मे कभी ना जाऊं। वैकुण्ठ में मुझे नहीं जाना, सामळिया मुझे वैकुण्ठ को नहीं जाना
उसकी खुशबु, तन को पावन करे
मेरा शीश उसके आगे ही झुके
बलिदान मेरा कभी, ना जाए बेकार
उसकी कीर्ति रहे बरकरार। वैकुण्ठ में मुझे नहीं जाना, सामळिया मुझे वैकुण्ठ को नहीं जाना
मैंने उस की गोद में ही समाना
जीवन को यशस्वी और सार्थक बनाना
सपने में भी स्वर्ग को ना जाऊं
इसी धरती में खुद समा जाऊं। वैकुण्ठ में मुझे नहीं जाना, सामळिया मुझे वैकुण्ठ को नहीं जाना
,
धरती के रहे, बड़े उपकार
में करलू समर्पित और सपने साकार
मेरे मन में उठे कई आकार
सुन लू धीरे से उसकाधबकार । वैकुण्ठ में मुझे नहीं जाना, सामळिया मुझे वैकुण्ठ को नहीं जाना
हसमुख मेहता
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, धरती के रहे, बड़े उपकार में करलू समर्पित और सपने साकार मेरे मन में उठे कई आकार सुन लू धीरे से उसकाधबकार । वैकुण्ठ में मुझे नहीं जाना, सामळिया मुझे वैकुण्ठ को नहीं जाना हसमुख मेहता Hasmukh Amathalal