नहीं चाहता.. Nahi Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

नहीं चाहता.. Nahi

में नहीं चाहता
शनिवार, २५ जुलाई २०२०

में नहीं चाहता था की बुढ्ढा हो जाऊं
अपने आप को जीवन से अलग कर पाऊं
आज भी मेरा मन उड़ने को चाहता है
आजाद पंछी की तरह खूब सेर करना चाहता है।

शरीर तब बोल पड़ा " नहीं, अब नहीं "
अब मेरे में हिम्मत नहीं
जैसे शरीर निष्प्राय हो चला है
और कुछ करने की हिम्मत भी नहीं है।

"पिताजी, " अब आपको कुछ करने की जरुरत नहीं है
बहुत कुछ कर लिया, अब विश्राम करना है
सबसे मिलकर अपना समय व्यतीत करना है
और अपने अतीत को खंगालकर खुश रहना है।

में कभी कभी बोल पड़ता
"मेरे समय ऐसे नहीं चलता था"
पाँव ही हमारा असली साथी था
शरीर हमेशा संगाथी था।

लोग अचरज से मुझे देखते है
कान में कानाफूसी भी कर लेते है
"देखो, अब मजे से जिंदगी बसर करेगा "
आराम करने में कोइ कसर नही छोड़ेगा।

मुझे ग्लानि भी होती और हंसी भी आ जाती
उनकी ऐसी कहा-सुनी मेरे को नहीं भाती
कई बार तो रमूज सी हो जाती
मुझे मेरे बचपन के दिनों की याद दिला जाती।

मेरे कार्यकाल में मुझे दिक्कत नहीं हुई
अवकाशप्राप्त होने के बाद भी बोरियत महसूस नहीं हुई
हां एक बात जरूर हुई और समज मे भी आई!
लोगों के पास समय बहुत है इसलिए मुझे घृणा नहीं आई।

"अब तो भगवान का नाम लेते रहना "
अपनी सारी कमाई बच्चों को मत दे देना
में सोचता रहता"यदि बच्चों को नहीं तो फिर किसको"?
उनकी ऐसी बाते सुनकर में कहता" अब आप खीसको "

डॉजाडीआ हसमुख

नहीं चाहता.. Nahi
Saturday, July 25, 2020
Topic(s) of this poem: poem
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" अब तो भगवान का नाम लेते रहना " अपनी सारी कमाई बच्चों को मत दे देना में सोचता रहता" यदि बच्चों को नहीं तो फिर किसको" ? उनकी ऐसी बाते सुनकर में कहता" अब आप खीसको " डॉ जाडीआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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