प्रेमदीवानी, , Parem Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

प्रेमदीवानी, , Parem

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प्रेमदीवानी
मंगलवार, २५ सितम्बर २०१८

मैं तोहो गयी प्रेम में दीवानी
रातो की निन्दर हो गयी वीरानी
ये तो है घर घर को कहानी
मेरी अपनी और तम्हारी अपनी।

प्रेम होता नहीं, हो जाता है
वो कहकर कभी नहीं आता है
जो गया उसमे लिप्त, नो हो जाता है समाप्त
उसके नहीं सुझता की कौन है पराया और आप्त।

दिन छोटा और रात लम्बी लगती है
दिन मैभी भूख नहीं लगती है
साजन को मिलने की तमन्ना लगी रहती है
जब मिल जाय तो पाँव टिकते नहीं है।

प्यार होना स्वाभाविक है
कुदरत का अलौकिक उपहार है
दोनों पात्र होनहार लगते है
प्यार के काबिल यहां ऐसे कई बस्ते है।

ना करो जुल्म और सता ओ
जो सके तो थोड़ा सा आशीर्वाद दे दो
हाजन भी मिले उन्हें तनहा ना करो
भगवान् की देन समझकर उन्हें दिल से माफ़ करो।

हसमुख अमथालाल मेहता

प्रेमदीवानी, , Parem
Tuesday, September 25, 2018
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 25 September 2018

ना करो जुल्म और सता ओ जो सके तो थोड़ा सा आशीर्वाद दे दो हाजन भी मिले उन्हें तनहा ना करो भगवान् की देन समझकर उन्हें दिल से माफ़ करो। हसमुख अमथालाल मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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