प्रीत की सगाई
रविवार, ४ जुलाई २०२१
दूर से ही देखा करते थे
मन ही मन अभिलाषा भी रखते थे
सपने संजोया करते थे
एक दूसरे में समा जाने की कल्पना भी करते थे।
भगवान् ने चाहा और बात हो गई
हमारी मुराद पूरी हो गई
बागी में सजी दुल्हन ससुराल आ गई
इस घर को अपना बनाकर बहु बन गई।
मुझे कभी नहीं महसूस हुआ
और नाही कोई अफ़सोस हुआ
सब मर्जी के मुताबिक ही हुआ
पर उनसे कभी सहज प्यार नहीं हुआ।
में चाहती थी की लता बन जाउ
पेड़ के इर्दगिर्द लिपट कर छाया पाऊ
पर ना कर सकीय मन की मुराद पुरी
रह गई बात दिल की अधूरी।
कमी तो लगी पर दिल को बुरी नहीं लगी
सामने ही तो थे मनको में मनाने लगी
प्यार बढ़ता गया रात सुनहरी होती गई
पहलेवाली बात अब नहीं रह गई
अब तो मन करता था कभी अलग ना होउ
बस लिपटी रहूं और प्यार के गीत गाऊ
मन से ही मन में तो मीरा बन गई
राधा की मानो सहेली बन गई।
यही तो प्रीत है
प्रीत की सगाई है
जिसने भी इसकी धुन लगाईं है
हरदम उसने अपनी बात सुनाई है।
डॉ हसमुख मेहता
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Manish kumar jain.