पुरानी सौंदर्यता
शुक्रवार, २५ दिसंबर २०२०
नदियाँ तुम क्यों बहती हो?
क्यों मानवजात को ना कहती हो
अपने आप चुपचाप रहती हो
बस समंदर से मिलने के पहले ही लुप्त हो जाती हो।
कोई सज्जन जिस बस्ति में ना हो
जहाँ नारियों पर अत्याचार हो
हमारे बिचार तनिक भी ना मिलते हो!
उनके सुख की चिंता क्यों करती हो।
एक दूसरेपर वार करने को उत्सुक रहते हो।
जहाँ लोग मानवता विरूद्ध काम करते हो
कुदरत पर प्रकृति का सरे आम उल्लंघन करते हो
ऐसी नगुनि मानवजात की सुखाकारी तुम क्यों सोचती हो।
पहाड़ के ऊँचे-ऊँचे शिखर
आपने कभी नही देखी है पानखर
मानवजात की मानसिकता की आप रखते खबर
आपकी बेरुखी का हो जाता बड़ा असर।
आप सब ने नहीं छोड़ी महानता
भले ही मानवजात ने दिखाई हो नीचता
जंगल के जंगल साफ़ कर दिए
पशु- पक्षी सबके घर तहस-नहस कर दिए।
नियमों का पालन सब ने करना है
सोहार्दपूर्ण वातावरण बनाकर जीना है
यदि प्रकृति का साथ मिल जाए तो जीवन सफल हो जाए
वो पुरानी सौंदर्यता हमें वापस दिखने को मिल जाए।
डॉ जाड़ीआ हसमुख
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