बालू के ढेर पर बैठकर,
मैं महलों का ख्वाब बुनता हूँ।
राई को मुट्ठी में लिए,
ख्वाबों का एक महल बुनता हूँ।
सपने बिखर जाते हैं
राई की तरह,
कुछ ही समेट पाता हूँ।
सपनों को बिखरता देख,
मैं खुद बिखरता हुआ
महसूस करता हूँ।
सपने हजारों बुनता हूँ,
साकार करने की इच्छाशक्ति को...
जब आगे बढ़ाता हूँ,
तो बीच में नाकामी,
अपनी जगह बना लेती है।
अथक प्रयास करता हूँ,
समेटने का उस राई को।
एक समेटता हूँ,
तो दूसरा बिखरता है।
यह कशमकश राई को समेटने की,
हस्त रेखा से टकराकर बिखरने की...
इस बिखराव का गम तो होता है,
पर मैं हताश नहीं होता हूँ।
इस बिखरी राई की तरह,
मैं हार स्वीकार नहीं करता हूँ।
तूफानों से लड़ता मैं,
राई का पहाड़ बनाने की
कोशिश करता हूँ।
कशिश इतनी कि
कभी टूटता है,
तो कभी बिखर जाता हूँ।
हस्त रेखा कहती है
पहाड़ नहीं बनेगा,
पर मेरी कोशिश कहती है
प्रयास नहीं रुकेगा।
जब तक जान है,
इस मिट्टी के शरीर में,
राई समेटने का ये कशिश,
कभी नहीं झुकेगा।
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