यादों का महासिन्धु Poem by Rajnish Rajan

यादों का महासिन्धु

प्रेम-अनुनय करता हूँ तुमसे, स्मृतियों में अनुराग भरो,
दग्ध हो रहा विरह-तपन में, यादों को मधु-सिक्त करो।
मन्थित तुम कर न सकोगी, यादों को अब हाला कर दो,
पात्र-अतीत से छलकूँगा मैं, मौन सिहरन न पाऊँगा।।

क्रंदन करता, निद्रा चुनता; स्मृतियों में ही जीता हूँ।
निद्रा के अब, अंक-पाश में; शून्य स्वप्न ही पाता हूँ।।
इन पलकों को, चैन कहाँ अब; क्षण-क्षण घोर व्यग्रता है।
शूल-सदृश अब, पीर चुभ रही; व्यथा-मयी यह श्रेणी है।।

पल-पल में ही, नींद उचटती; स्मृतियाँ मन्थित करतीं।
मुझको निद्रा, के घेरों से; विरह-वेग विमर्दन करतीं।।
नयनों से ये, लहरें बहतीं; सिन्धु सदृश दुख सारा है।
प्रवाह का यह, प्रबल वेग अब; रैन भर मुझे मारा है।।

अश्रु उमड़ते, हृदय पटल पर; मुख से कह न पाता हूँ।
पौरुष की इस, भीड़ में रहकर; साँसें भी सहमाता हूँ।।
अंतर्मन में, राज दबाए; घुट-घुट कर मैं मरता हूँ।
ओढ़ के चादर, तन्हाई की; आहें अपनी भरता हूँ।।

ग्रास उठाूँ, हाथ थमे अब; तेरी याद में जीता हूँ।
पल-भर को मैं, तुझे सोचता; सुबक-सुबक रह जाता हूँ।।
आँखें मूँदूँ, सो न पाता; बंद नयन तेरा साया है।
तू हलचल है, तू ही आँधी; यादें दरकती काया है।।

उदर क्षुधित है, तड़प रहा पर; अन्न न अंगीकारता है।
जिह्वा जड़वत, शब्द दरकते; मन तुझे आह्वानता है।।
कंठ शुष्क है, प्राण अतृप्त अब; चाहत तेरी प्यासी है।
अस्थि-शेष यह, काया व्याकुल; रूह तेरी वृष्टि-दासी है।।

दिवस संभालूँ, रैन संभालूँ; करुण-कलित ही जीता हूँ।
जग उन्मादी, संज्ञा देता; मर्म न कोई पाता है।।
हस्त उद्यत, पग जड़वत अब; स्मृतियों की क्या सीमा है।
जीना तो, सिखला न सके तुम; मृत्यु भी अब भारी है।।

रिक्त अंतस, दीन वपु अब; स्वयं से हारा हुआ हूँ।
नियति के इस, क्रूर चक्रित; घात से मारा हुआ हूँ।।
याचना का, स्वर हुआ मृत; मौन ही अब वेश मेरा।
धूल का बस, तुच्छ कण हूँ; पीर ही परिवेश मेरा।।

याद संभालूँ, कैसे तेरी; आँखें बंजर हो गईं।
राह तकूँ मैं, दिन-भर तेरी; आँखें सूखी रोती हैं।।
महक-महक जो, सावन बीता; भीगा भादो आया है।
वर्षों बीते, मुख न देखा; रूह जलाता साया है।।

धुंधलाती नहीं स्मृति तेरी, अमित आसव सी जिद्दी है,
जितना चाहूँ विस्मृत करना, उतनी तीव्र ये रिद्धि है।
यादों में अनुराग न हो तो, कर बदनाम ही मुक्त करो,
विस्मृति का वरदान दे अब, इन साँसों को मुक्त करो।।

हृदय का यह, रिक्त कोना; वह्नि का अब कुंड बन जा।
पीर तेरी, वज्र जैसी; देह का पाषाण चुन जा।।
मथ रहा है, प्राण को अब; स्मृतियों का उग्र मन्थन।
दग्ध हूँ मैं, रक्त रंजित; कर रहा है मौन क्रन्दन।।

साँस जैसे, तप्त लोहक; कण्ठ को अब चीरती है।
विकल मेरी, यह अवस्था; रूह को अब पीरती है।।
चीख बन कर, गूँजता हूँ; मौन का यह शोर कैसा।
अश्रु में अब, आग बहती; नियति का यह भोर कैसा।।

ध्वंस कर दूँ, बोध सारा; राख अपनी ही चुनूँ मैं।
पीर के इन, कंटक पथ पर; मौत की चादर बुनूँ मैं।।
हूँ विक्षिप्त, हूँ मैं व्याकुल; धड़कनों में शूल जागे।
अस्थि मेरी, गल रही अब; मृत्यु के ही द्वार आगे।।

नयन सजल हैं, रैन कराहती; निद्रा घूँट पिलाती है।
स्मृतियाँ फिर, फिर टकरातीं; सोए को जगा जाती हैं।।
मेरी रूह, टटोलती मुझको; खोया-खोया पाती है।
व्याकुल भीगी, रूह मेरी अब; स्वप्न समेटने जाती है।।

स्मृतियाँ शेष मेरी भी होंगी, तू संजो ले प्रेम-पाषाण।
अंजुलि भर तू पिला रही जो, पात्र भरा यह हाला-प्राण।।
साकी तू मधुशाला जी ले, मदिरा बन तू बहती रह।
हस्त-लेख जो विधि ने खींचा, मैं विष पियूँ, तू जीती रह।।

पर न्याय यही हो नियति-बद्ध, जब अंत समय तेरा आए।
स्मृति-दंश की तीक्ष्ण ज्वाला, तुझको भी वैसे तड़पाए।।
पात्र भरा हो यादों का तब, तू भी घूँट वही पी ले।
जो पीकर मैं मृत्यु वरण हूँ, तू भी वह विष पीकर जिए।।

रोम-रोम को, दग्ध किया अब; रूह जलाकर जीता हूँ।
यादों में तुम, को ही जीकर; स्मृतियों का विष पीता हूँ।।
तू साकी है, विरह-जाम की; मैं प्यासा रह जाता हूँ।
यादों के इस, महासिन्धु में; हर रात डूब जाता हूँ।।

शेष क्या अब, रिक्त हूँ मैं; भस्म का बस पुंज हूँ मैं।
स्मृति-चिता की, वह्नि में अब; मौन का अनुगूंज हूँ मैं।।
न आदि मेरा, न अंत कोई; व्योम में एकाकार हूँ मैं।
तेरी विरह की, अग्नि में अब; आत्म-आहुति का सार हूँ मैं।।

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success