मैं
ब्रह्मांड की सबसे बड़ी पहेली है,
जिसे हम गहराई से कभी टटोलते नहीं हैं।
मैं
यानी हमारा अपना अस्तित्व —
इस सृष्टि का सबसे गहरा रहस्य है।
मैं
अज्ञानियों के लिए एक सीमित शरीर है,
और ज्ञानियों के लिए अनंत, असीम चेतना है।
मैं
न शरीर है, न मन, न बुद्धि —
यह साक्षात् ब्रह्म का ही स्वरूप है।
मैं
निराकार होश है।
मैं
इस ब्रह्मांड से अलग नहीं,
बल्कि स्वयं ब्रह्मांड है।
मैं
जिसमें न कुछ जोड़ा जा सकता है,
न घटाया जा सकता है;
यह पहले से ही पूर्ण है।
मैं
बचपन से अब तक की यादों का
एक जीवित संग्रह है।
मैं
समय से पूरी तरह परे है;
यह न भूत है, न ही भविष्य,
यह हमेशा 'अभी' की शाश्वत स्थिति है।
मैं
वह है जो हर पल फैसले लेता है;
इस पल जो चुनते हैं,
वही आपका 'मैं' बन जाता है।
मैं
समाज, धर्म या दूसरों द्वारा दी गई
परिभाषाओं से पूरी तरह स्वतंत्र,
एक शुद्ध अस्तित्व है।
मैं
कभी अहं है, तो कभी स्वाभिमान;
अहं जहाँ एक सुरक्षा कवच है,
जो डर और असुरक्षा से पैदा होता है और इंसान को बांधता है,
वहीं स्वाभिमान देता है आत्म-सम्मान।
मैं
कोई उलझा हुआ शब्द नहीं,
बस एक सीधा अहसास है,
जो सहज ही मिल जाता है
साक्षी ध्यान के मौन में।
मैं
ऊर्जा का एक रूप है,
जो समय सचेत है।
मैं
न आदि की सीमा में है,
न अंत के बंधन में;
यह तो अनंत आकाश सा,
साक्षात् 'शिवोऽहम्' है।
मैं
अध्यात्म, विज्ञान, मनोविज्ञान
और प्रेम का एक अनूठा संगम है।
मैं
जब मिटता है,
तो केवल प्रेम ही शेष बचता है।
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