रामायण सार
जनम लिए दशरथ के घर, राम उतारने पाप धरा से।
तोड़े धनुष शिव का जनकपुर, व्याह रचाये जनकसुता से।
गुरु के प्रति सत्कार अति, दिलाये राक्षसों से छुटकारा।
शाप के कारण पाहन बनी, देवि अहिल्या को है तारा।
कुटिल विचार धरे मंथरा, कैकेयी को कलह पढ़ाई।
नीच की सीख से वर मांगी, राम को वन की राह पठाई।
राम चले वनवास सखे, आज्ञा पिता की सिर पर धारे।
धर्म की रक्षा करने हेतु, दैत्य दानवों को संहारे।
राम को करना पार नदी, जग का है जो खेवनहारा।
पांव पखार बिठाया नाव, केवट गंगा पार उतारा।
करके ढिठाई सूर्पणखा, प्रभु से, अपनी नाक कटाई।
बिलखती हुई लंका जाके, भाई रावण को भड़कायी।
लोभ के वश आ सोने कीमांगी सीता मृग की छाला।
लक्ष्मण रेखा तोड़ीं जानकी, रावण ने हरण कर डाला।
भक्त के वत्सल राम सदा, सबरी के जूठे बेर को खाया।
कृपा के सिंधु हैं भक्तों के, हनुमान को गले लगाया।
सुग्रीव की बालि से रक्षा कर, मित्र अपना परम बनाया।
सुग्रीव वानरी सेना भेजा, देवि सिया का पता लगाया।
नल व नील की ले के मदद, सागर पर सुन्दर सेतु बना।
उछल कूद करते उस पुल से, लंका पहुंची वानर सेना।
नीति की बात कही भ्राता की रावण ने तत्पल ठुकराया।
दर्प, दुष्टता के कारण ही स्वयं अपना काल बुलाया।
दुष्टदलन की नीति राम की लंकापति पर विजय दिलाई।
धैर्य, धर्म, विवेक, वीरता से, राक्षसों से मुक्ति पायी।
- एस. डी. तिवारी
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Incarnation of Lord Rama in family of Dasharath was happened for good of mankind. In this lovely and excellent poem you have sung the song of devotion of the Holy Ramayana beautifully. Patience, love, courage and righteousness sprinkled in this poem easily motivate a reader to sing RAMA KATHA...JAI SHRI RAM. This is an excellent poem....10