परम् चेतना। Poem by ramesh rai

परम् चेतना।

भूख चेतना की आत्मा है
भूखा ही बतला सकता है
कैसी है भूख की ज्वाला
भूख की अतृप्त भाव भंगिमा।

भूख की अतृप्त भाव भंगिमा
परम चेतना की पहचान है।

हर संतृप्त आत्मा गुजरती है
जठराग्नि की परम ज्वाला से
झुलसती है ईच्छाओं की लपटे
तभी तो सिद्धार्थ बने बुद्ध।

किया विश्व को प्रज्वलित
शायद था जठराग्नि का प्रकोप
जिससे मिली प्रकाश की अनुभूति
हुआ प्रकाशमय पूरी प्रकृति।

परम चेतना हुई प्रकाशित
दिया बोधिसत्व का ज्ञान।

Created on 09/10/2025
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@ Ramesh Rai

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