बादलों का गर्जन। Poem by ramesh rai

बादलों का गर्जन।

बादल क्यूं इतना गरज रहे हैं
क्यूँ आकाश शोर मचाता है।
किस पीड़ा से वह जूझ रहा
या फिर अपनी वेदना बता रहा।।

धरती की काया है तपती
जैसे इसे बुखार हुआ है।
हर पंखुड़ियां है झुलस रही
हर कानन है जल रहा।।

गरम हवाओं के झोंको से
अवनी अम्बर पिघल रहा।
तभी तो बादल गरज रहा
सबकी पीड़ा को हर रहा।।

Created on 18/9/2025
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@ Ramesh Rai

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