सो जाओ नींद की गहराई में
नींद तुम्हें बुला रही
नींद की तरूणाई बरबस
यौवन की अंगड़ाई ले रही।
आज मानो नींद अपनी
लय से तुम्हें बुला रही
स्वर्णिम प्रभा बैठी हुई है
भोर का आंचल पसारे।
नींद जितना भी हो गहरा
प्रभात की बेला सुखद है
आज मानो नींद क्यूं
अपनी हवस मिटा रही।
जब सोया संसार था
तुम जाग रहे थे अविरल बन
अब जग रहा संसार है
जीवन निष्क्रिय तुम उद्धत हो।
Created on 23/9/2025
Last stanza on 02/10/2025
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@ Ramesh Rai
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