रात्रि की विडम्बना Poem by ramesh rai

रात्रि की विडम्बना

सुधा रात्रि में बीत रही
जीवन की असीम कल्पना
जैसे कुंज गली में
बिखरी हुई असीम चेतना।

ध्रुव कानन में जैसे
निखरी हुई लावण्य प्रभा
जीवन का सौरभ पीती
शुभ्र कल्पना की व्यथा।

रात्रि आज निस्तबध है
बना रही ऊर्जावान जगत
ऐसी क्या आन पड़ी
सुखद जीवन बना रही।

रात्रि की सुखद परिभाषा
फैल रही दसों दिशा।

Created on 02/9/2025
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@ Ramesh Rai

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