जब सो गई चांदनी। Poem by ramesh rai

जब सो गई चांदनी।

जब सो गई चांदनी
बिखर गया चंद्रमा
बिखर गए तारे सभी
नभ बना तारों रहित।

चंद्रमा की चांदनी
आज क्यूं सो गई
विभावरी भी आज
शून्य में खो गई।

है कहां वह चांदनी
है कहां वह विभावरी
है कहां नभ का प्रियतमा
है कहां रजनी प्रभा।

विलीन हो गए सभी
विलीन हो गया आसमा ।

Created on 21/9/2025
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@ Ramesh Rai

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