Hasmukh Amathalal

Gold Star - 685,446 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

सहारा Sahara - Poem by Hasmukh Amathalal

सहारा

जिसने ढूंढा सहारा
समझलो वो जरूर हारा
वो बिल्कुल निश्चित है
आदमी चिंतित सा रहता है।

हमें सहारा क्यों चाहिए?
क्या हम काबिल नहीं है?
या कोई कोई रास्ता नहीं दिखता?
जो भो हो, सोच में है असमानता।

सहारा किसे चाहिए?
जिसे अपना मकसद पूरा करना हो?
अपनी हैसियत ना हो और जरिया ना हो
ऐसे में सहारा आवश्यक हो जाता हो।

सहारा उसे चाहिए जो समर्थ ना हो
कुछ भी करने में असमर्थ हो
कुछ मजबूरियां भी सहारा के लिए आगे करती है
सहारा एक अति आवश्यक चीज़ के रूप में महसूस करती है।

सहारे के लिए तभी कल्पना करो
जब अपने आपको महसूस हुआ हो
अपनी रणनीति के मुताबिक आवश्यकता हो
सहरा तब एक एक जीवनी बन चुका हो।

Topic(s) of this poem: poem


Comments about सहारा Sahara by Hasmukh Amathalal

  • Mehta Hasmukh Amathalal (8/11/2017 3:25:00 AM)

    सहारे के लिए तभी कल्पना करो
    जब अपने आपको महसूस हुआ हो
    अपनी रणनीति के मुताबिक आवश्यकता हो
    सहरा तब एक एक जीवनी बन चुका हो।
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Poem Submitted: Friday, August 11, 2017



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