सहर्ष अपनाए Saharsh Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

सहर्ष अपनाए Saharsh

सहर्ष अपनाए

हो सकता है
मेरा नजरिया ही गलत है
में सोचता हूं वो नहीं होगा
अपनेपन का एहसास नहीं होगा।

जो हो रहा है उसमें उसकी मर्जी होगी
मेरी जिंदगी में कठिनाईया आती रहेगी
जो सरल दीखता है वो कठिन हो जाएगा
पछतावे के अलावा कोई विकल्प ही बचेगा।

ये तो उधार की जिंदगी है!
आपने सिर्फ करना बंदगी है
उपरवाले पर सब छोड़ देना है
दुःख हो या सुख, उसे ही अपनाना है।

कई शतकगुजर गए है
पर हम वहीँ के वही है
ना हम समझना चाहते है
और नाहीं अपनाते है।

वो कभी आपकी नही होगी
आपको उसकी आदत डालनी होगी
जैसे सुबह और सवेरा होता है
वैसे ही जीवन में ठीक अंधेरा और उजाला होता है।

किसी पशोपेश में ना पड़े
अपनी लड़ाई खुद लड़े
संघर्ष करे और पसीना बहाए
जो भी उसे सहर्ष अपनाए।

सहर्ष अपनाए Saharsh
Saturday, February 17, 2018
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
Close
Error Success